हमारे शरीर पर खानपान के अलावा ऋतुओं का भी प्रभाव पड़ता है। आयुर्वेद के अनुसार एक ऋतु में कोई एक दोष बढ़ता है, तो कोई शांत होता है और दूसरी ऋतु में कोई दूसरा दोष बढ़ता तथा अन्य शांत होता है। एक वर्ष को छह ऋतुओं में बांटा गया है। इस तरह हमारे शरीर पर ऋतुओं का विशेष प्रभाव पड़ता है। आयुर्वेद में प्रत्येक ऋतु में दोषों में होने वाली वृद्धि, प्रकोप या शांति के अनुसार अलग-अलग प्रकार के खानपान और रहन-सहन का उल्लेख किया गया है। इस संबंध में लोकोक्ति है कि श्रावण मास में दूध, भाद्रपद में छाछ, क्वॉर मास में करेला और कार्तिक मास में दही का सेवन नहीं करना चाहिए। तो आइए आयुर्वेदिक हैल्थ कैलेंडर से जानते हैं कि अलग-अलग ऋतु के अनुसार हमारा आहार-विहार कैसा हो, ताकि यह साल स्वास्थ्यवर्धक बना रहे
जनवरी-फरवरी (शिशिर ऋतु)
शिशिर ऋतु वर्ष वर्ष की सबसे ठंडी, ऋतु मानी जाती है। इस समय ठंड के कारण शरीर की ऊष्मा भीतर सिमट जाती है, जिससे पाचन अग्नि प्रबल होती है। इस काल में भूखा रहना और रूखा-सूखा भोजन हानिकारक है। पर्याप्त मात्रा में भोजन रूपी ईधन न मिलने से शरीर में वात दोष बढ़ जाता है।
दोष स्थितिः कफ दोष का संचय, शीत और रूक्षता के कारण वात प्रभाव बना रहता है।
आहारः शीत ऋतु में चिकनाई, मधुर, लवण और अम्ल रस युक्त पोषक तत्त्वों वाले पदार्थों का सेवन करना चाहिए, जैसे घी, दूध, नया अनाज, तिल, गुड़, उड़द, आंवला-सेब का मुरब्बा, मेवों से बने पदार्थ, अंकुरित चना, मूंग, गेहूं एवं चना की रोटी, वर्षभर पुराने चावल, मेथी, सोंठ, हरी सब्जियां, गर्म जल, गर्म पदार्थ आदि का सेवन करें।
विहारः व्यायाम और योगासन करें। तेल मालिश, उबटन एवं सिर पर तेल मालिश करना उपयोगी है। सरसों के तेल में कर्पूर डालकर मालिश करने से जोड़ों का दर्द और गठिया आदि में आराम मिलता है। गर्म कपड़े पहनें, गर्म पानी पीएं, धूप लेना लाभकारी है।
रखें ध्यानः देर रात तक जागना, व्यायाम न करना, कटु, तिक्त और कषाय रस वाले पदार्थ, खटाई, खट्टा दहीं, आम का अचार आदि का सेवन कम से कम करें।
उपायः अदरक, पिप्पली, हरीतकी, तुलसी, लहसुन फायदेमंद है। हरड़ के साथ आधा चम्मच पिप्पली का चूर्ण ताजा पानी के साथ लें।
मार्च-अप्रैल(वसंत ऋतु)
वसंत ऋतु सब ऋतुओं से सुहानी होती है। यह ऋतु शीतकाल और ग्रीष्म काल का संधि समय होता है। इस ऋतु में सूर्य की किरणें तेज होने लगती हैं। शीत काल में शरीर के अंदर जो कफ जमा हो जाता है, वह इन किरणों की गर्मी से पिघलने लगता है। इससे शरीर के कफ दोष बढने से खांसी, जुकाम जैसी समस्याएं बढ़ जाती हैं।
दोष स्थितिः कफ का प्रकोप बढ़ जाता है।"
आहारः इस ऋतु में कटु रस युक्त, तीक्ष्ण और कषाय पदार्थों का सेवन लाभकारी है। मूंग, चना और जौ की रोटी, पुराना गेहूं या चावल, अंकुरित चना, मक्खन लगी रोटी, हरी शाक सब्जी और उनका सूप, सरसों का तेल, सब्जियों में करेला, लहसुन, पालक, जिमीकंद एवं कच्ची मूली, नीम की नई कोंपलें, सोंठ, पीपल, कालीमिर्च, त्रिफला, नींबू, मौसनी और शहद का प्रयोग बहुत लाभकारी है।
विहारः सूर्योदय से पहले भ्रमण करने से स्वास्थ्य में वृद्धि होती है। नियमित रूप से हल्का व्यायाम और योगासन करें। तेल की मालिश करें, उबटन लगाकर गुनगुने पानी से स्नान करें।
रखें ध्यानः जल अधिक मात्रा में पीना चाहिए। भारी, चिकनाई युक्त, खट्टे व मीठे एवं शीत प्रकृति वाले पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए। नया अनाज, उड़द, रबड़ी, मलाई जैसे भारी भोज्य पदार्थ एवं खजूर का सेवन करना भी ठीक नहीं है।
उपायः नीम, हल्दी, धनिया, जीरा और सौंफ लाभकारी है। हरड़ के चूर्ण को शहद के साथ मिलाकर सेवन करना फायदेमंद है।
मई-जून( ग्रीष्म ऋतु)
ग्रीष्म ऋतु में पृथ्वी का तापमान एकदम बढ़ जाता है। शरीर में पसीना अधिक मात्रा में आता है। प्यास अधिक लगती है। जीवाणु संक्रमण शीघ्र होता है और उल्टी-दस्त संबंधी समस्याएं होने लगती हैं।
दोष स्थितिः इस ऋतु में शरीर में पित्त संचय एवं वात प्रभाव बढ़ जाता है।
आहारः ग्रीष्म ऋतु में हल्का, चिकना, मधुर रस युक्त, सुपाच्य, शीतल और तरल पदार्थों का सेवन अधिक मात्रा में करना चाहिए। चीनी, घी, दूध, दही का सेवन करना चाहिए। पुराने जौ, मौसमी फल-सब्जियां, सूखे मेवों में किशमिश, मुनक्का, अंजीर, बादाम भीगे हुए खाना फायदेमंद है।
विहारः सुबह के समय बाग-बगीचों में भ्रमण करना लाभकारी है। सूती एवं सफेद या हल्के रंग के वस्त्र पहनने चाहिए। बाहर धूप में नहीं घूमना चाहिए। घर से निकलते समय एक गिलास ठण्डा पानी अवश्य पीना चाहिए। एक साबुत प्याज साथ में रखें, इससे लू नहीं लगेगी। ठंडी जगह पर रहें।
रखें ध्यानः इस ऋतु में भोजन कम मात्रा में और खूब चबा-चबा कर खाना बहुत जरूरी है। भोजन ताजा और गर्म लेना चाहिए। रात का भोजन विशेष रूप से हल्का और सुपाच्य होना चाहिए। यदि हो सके तो इस समय सप्ताह में एक-दो बार खिचड़ी खाएं।
उपायः चंदन, पुदीना, धनिया और गुलाब का प्रयोग' लाभकारी है। हरड़ का सेवन समान मात्रा में गुड़ मिलाकर करना चाहिए। चंद्रमा दर्शन करना भी सेहतमंद है।
जुलाई-अगस्त(वर्षा ऋतु)
वर्षा ऋतु में वातावरण में नमी का प्रभाव शरीर पर भी पड़ता है। ग्रीष्म ऋतु में पाचन शक्त्ति पहले से ही दुर्बल होती है। वर्षा ऋतु की नमी से वात दोष कुपित हो जाता है और पाचन शक्त्ति अधिक दुर्बल हो जाती है। संक्रमण से मलेरिया और बुखार, जुकाम, दस्त, पेचिश, हैजा, गतिया, जोड़ों में सूजन आदि समस्याएं होने लगती हैं।
दोष स्थितिः वात को प्रकोप बढ़ जाता है। एवं जठाग्नि मंद हो जाती है।
आहारः वर्षा ऋतु में हल्के, सुपाच्य, ताजा, गर्म और पाचक अग्नि को बढ़ाने वाले खाद्य-पदार्थों का सेवन हितकारक है। अम्ल, लवण युक्त, पुराना अनाज, गेहूं, जौ, शालि और साठी चावल, मक्का (भुट्टा), खीरा, मूंग, पुदीना, मौसमी फल, घी-तेल से बने नमकीन पदार्थ, शहद, सूप, अदरक युक्त भोजन विशेष रूप से लाभकारी हैं।
विहारः शरीर पर उबटन मलना, मालिश और सिकाई करना लाभदायक है। दिन में सोना नहीं चाहिए। हल्का शारीरिक व्यायाम ही करें। धूप में घूमना और सोना, अधिक पैदल चलना या अधिक शारीरिक व्यायाम भी हानिप्रद है। पंचकर्म (बस्ति) लाभकारी है।
रखें ध्यानः इस ऋतु में जल की शुद्धि का विशेष ध्यान रखना चाहिए। भारी भोजन, बार-बार भोजन करना और भूख न होने पर भी भोजन करने से बचना चाहिए। गीले, नमीयुक्त कपड़ों का प्रयोग न करें।
उपायः अदरक, सोंठ, पिप्पली, तुलसी लाभकारी है। रसायन के रूप में हरड़ का चूर्ण सेंधा नमक मिलाकर लेना चाहिए।
सितंबर-अक्टूबर(शरद ऋतु)
वर्षा के बाद शरद ऋतु में सूर्य अपने पूरे तेज तथा व गर्मी के साथ चमकता है। इस उष्णता कारण वर्षा ऋतु के दौरान शरीर में जमा हुआ पित्त दोष एकदम कुपित हो जाता है। इससे रक्त दूषित हो जाता है। इसके कारण पित्त और कफ के रोग जैसे बुखार, फोड़े-फुंसियां, त्वचा पर चकत्ते, खुजली आदि समस्या होती हैं।
दोष स्थितिः पित्त का प्रकोप बढ़ जाता है। वात दोष का शमन होता है।
आहारः पित्त को शांत करने के लिए घी या तिक्त पदार्थों का सेवन करना चाहिए। इस ऋतु में मीठे, हल्के सुपाच्य, शीतल और तिक्त रस वाले खाद्य और पेय पदार्थ विशेष रूप से उपयोगी हैं। शालि चावल, मूंग, गेहूं, जौ, उबला हुआ दूध, दही, मक्खन, घी, मलाई, श्रीखंड, सब्जियों में चौलाई, बथुआ, लौक, तोरई, फूलगोभी, मूली, पालक, सोया और सेम, फलों में अनार, आंवला, सिंघाड़ा, मुनक्का, कमलगट्टा लाभकारी हैं।
विहारः रात्रि के समय चंद्रमा की किरणों में बैठने, घूमने या सोने से स्वास्थ्य पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। चंदन उबटन लगाना फायदेमंद है। इस ऋतु में जल को दिन के समय सूर्य की किस्मों में तथा रात्रि में चंद्रमा की किरणों में रखकर प्रयोग लाना चाहिए।
रखें ध्यानः सरसों का तेल, मट्ठा, सौंफ, लहसुन, बैंगन, करेला, हींग, कालीमिर्च, पीपल, उड़द से बने भारी खाद्य पदार्थ, खट्टे पदार्थ न खाएं।
उपाय: नीम, गिलोय, आंवला, हल्दी का सेवन लाभकारी है। हरड़ के चूर्ण का सेवने शहद, मिश्री या गुड़ मिलाकर करना चाहिए।
नवंबर-दिसंबर (हेमंत ऋतु)
हेमंत ऋतु ठंडी ऋतु मानी जाती है। इस समय ठंड के . कारण शरीर की ऊष्मा भीतर सिमट जाती है, जिससे पाचन अग्नि प्रबल होती है। दिन छोटे और रातें लंबी होने के कारण शरीर को आराम करने के साथ-साथ भोजन के पाचन के लिए भी अधिक अनुकूलता मिलती है।
दोष स्थितिः कफ संचय एवं जठराग्नि की क्रियाशीलता में वृद्धि होती है।
आहारः हेमंत ऋतु में चिकनाई, मधुर, लवण और अम्ल रस युक्त पदार्थों का सेवन करना चाहिए, जैसे घी, दूध, नया अनाज, तिल, गुड़, उड़द, आंवला-सेब का मुरब्बा, मेवे, हरी सब्जियां, रात में दूध पीना लाभकारी है।
विहारः इस ऋतु में व्यायाम का विशेष रूप से लाभमिलता है। इससे शरीर बलवान और सुडौल बनता है। सरसों के तेल की मालिश से त्वचा सुंदर और निरोग बनती है। अपनी शक्ति के अनुसार तेज चाल से चलना उचित है।
रखें ध्यानः ठंडी हवा से बचकर रहना चाहिए। ताप वाले स्थान पर रहना और सोना चाहिए। अग्नि और धूप लाभकारी है। धूप ओर से एवं अग्नि सामने से सेंकना सेंकना पीठ की चाहिए। कमरे का तापमान गर्म रखें।
उपायः अश्वगंधा, शतावरी, पिप्पली, अदरक का सेवन लाभकारी है। आधा चम्मच हरड़ एवं सम मात्रा में सोंठ चूर्ण का सेवन करना लाभकारी है।
