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Wednesday, April 8, 2026

सलूम्बर में फैली अज्ञात बीमारी पर बड़ा एक्शन, घर-घर सर्वे शुरू

राजस्थान के सलूम्बर जिले के लसाड़िया ब्लॉक के घाटा और लालपुरा गांवों में फैली अज्ञात बीमारी के कारण अब तक 7 बच्चों की मौत हो चुकी है। इस स्थिति को देखते हुए राज्य सरकार और स्वास्थ्य विभाग ने "हाई अलर्ट" मोड पर बड़े पैमाने पर एक्शन शुरू कर दिया है। राजस्थान के सलूम्बर जिले में बच्चों की मौत के मामलों को गंभीरता से लेते हुए राज्य सरकार ने बड़े स्तर पर स्वास्थ्य अभियान शुरू किया है। इस मामले में अज्ञात बीमारी की जांच के लिए तेजी से कदम उठाए जा रहे हैं।


मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा के निर्देश पर उदयपुर संभाग के सभी सात जिलों में निगरानी और रोकथाम अभियान चलाया जा रहा है। स्वास्थ्य मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर भी स्थिति पर लगातार नजर रख रहे हैं। सरकार ने विशेषज्ञ टीमों का गठन किया है, जो बीमारी के कारणों की जांच कर रही हैं। साथ ही RNT Medical College की टीम और राज्य स्तरीय दल ने प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर इलाज और जांच व्यवस्था का आकलन किया।


स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, 3,690 टीमों ने घर-घर जाकर सर्वे किया है और 52,000 से अधिक घरों को कवर किया गया है। इस दौरान 275 लोगों में बीमारी के लक्षण पाए गए, जिनमें से 25 को बेहतर इलाज के लिए बड़े अस्पतालों में भेजा गया। इसके अलावा 13,000 से अधिक स्थानों पर जागरूकता अभियान भी चलाया गया, ताकि लोग सावधानी बरत सकें। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने बताया कि सलूम्बर के सेमारी गांव में 4 साल के एक बच्चे की मौत की पुष्टि हुई है। वहीं, 651 मरीजों को मौके पर ही इलाज दिया गया।


बीमारी को फैलने से रोकने के लिए मच्छरजनित रोगों के खिलाफ भी अभियान चलाया गया, जिसमें 2,557 स्थानों पर एंटी-लार्वा गतिविधियां की गईं। जांच के लिए 1,796 ब्लड स्लाइड तैयार किए गए और 94 सैंपल लैब में भेजे गए हैं। सरकार ने लोगों से अपील की है कि अगर किसी को बुखार या अन्य लक्षण दिखें तो तुरंत नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र में संपर्क करें और सभी स्वास्थ्य दिशानिर्देशों का पालन करें।


स्वास्थ्य विभाग का बड़ा एक्शन और घर-घर सर्वे:

  • 3,690 टीमें तैनात: सरकार ने पूरे संभाग में 3,600 से अधिक टीमें तैनात की हैं।
  • 52,000 घरों का सर्वे: इन टीमों ने अब तक 52,000 से अधिक घरों का दरवाजा खटखटाकर स्वास्थ्य जांच की है।
  • 275 संदिग्ध मरीज मिले: सर्वे के दौरान बीमारी के लक्षण वाले 275 लोगों की पहचान की गई, जिनमें से 25 को बेहतर इलाज के लिए बड़े अस्पतालों में भेजा गया है।
  • विशेषज्ञों की निगरानी: मुख्यमंत्री के निर्देश पर जयपुर और उदयपुर के विशेष डॉक्टरों की टीमें प्रभावित क्षेत्रों में डेरा डाले हुए हैं। 


बीमारी के मुख्य लक्षण और वर्तमान स्थिति:

  • लक्षण: प्रभावित बच्चों में तेज बुखार, उल्टी, पेट दर्द, दस्त और शरीर में ऐंठन जैसे लक्षण देखे जा रहे हैं। बीमारी इतनी गंभीर है कि कुछ मामलों में 24 घंटे के भीतर ही बच्चे दम तोड़ रहे हैं।
  • प्रभावित आयु वर्ग: मरने वाले सभी बच्चों की उम्र मुख्य रूप से 2 से 4 वर्ष के बीच है।
  • जांच: शुरुआती सैंपल्स में कुछ सामान्य वायरस की रिपोर्ट नेगेटिव आई है, इसलिए बीमारी का सटीक कारण अभी भी "अज्ञात" बना हुआ है।
  • निवारक उपाय: प्रशासन द्वारा गांवों में फोगिंग, एंटी-लार्वा छिड़काव और लोगों को उबला हुआ पानी पीने की सलाह दी जा रही है।
अधिकारियों का कहना है कि स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है और जरूरत पड़ने पर तुरंत कार्रवाई की जाएगी।

Tuesday, April 7, 2026

अच्छा स्वास्थ्य ही मानव जीवन की सबसे बड़ी पूंजी है - राजस्व मंत्री

राजस्व मंत्री करण सिंह वर्मा ने सीहोर जिले के इछावर सिविल अस्पताल में मानसरोवर मेडिकल कॉलेज द्वारा आयोजित निशुल्क स्वास्थ्य परामर्श शिविर का शुभारंभ किया। इस शिविर में विशेषज्ञ डॉक्टरों द्वारा महिला रोग, हड्डी रोग, नेत्र और ईएनटी के मरीजों का स्वास्थ्य परीक्षण कर उन्हें निःशुल्क दवाइयां बांटी गईं।


राजस्व मंत्री श्री करण सिंह वर्मा ने इछावर सिविल हॉस्पिटल में मानसरोवर मेडिकल कॉलेज द्वारा आयोजित निःशुल्क स्वास्थ्य परामर्श शिविर का शुभारंभ किया। इस अवसर पर उन्होंने स्वास्थ्य सेवाओं के महत्व पर प्रकाश डालते हुए आमजन को शिविर का लाभ लेने के लिए प्रेरित किया। मंत्री वर्मा ने कहा कि स्वस्थ समाज के लिए नियमित जांच जरूरी है, और प्रदेश सरकार बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं देने के लिए प्रतिबद्ध है।


इस अवसर पर उन्होंने कहा कि अच्छा स्वास्थ्य ही मानव जीवन की सबसे बड़ी पूंजी है और समय-समय पर स्वास्थ्य परीक्षण कराना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति को सुलभ एवं बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए सरकार निरंतर कार्य कर रही है।


शिविर में महिला रोग, हड्डी रोग, शिशु रोग, नेत्र, ईएनटी सहित विभिन्न विशेषज्ञ डॉक्टरों द्वारा मरीजों का परीक्षण किया गया एवं परामर्श दिया गया। शिविर में कुल 384 मरीजों का स्वास्थ्य परीक्षण किया गया तथा निःशुल्क दवाइयों का वितरण किया गया। साथ ही ईसीजी, ब्लड प्रेशर एवं शुगर की जांच भी की गई। इस अवसर पर एसडीएम श्रीमती स्वाति मिश्रा, सीएमएचओ डॉ सुधीर डेहरिया, मानसरोवर ग्रुप के प्रो-चांसलर ईआर. गौरव तिवारी सहित जनप्रतिनिधि, एवं अन्य सदस्य उपस्थित थे।


शिविर की मुख्य विशेषताएं:

  • आयोजक: मानसरोवर मेडिकल कॉलेज (सिविल अस्पताल, इछावर के सहयोग से)।
  • विशेषज्ञ सेवाएं: महिला रोग, हड्डी रोग, शिशु रोग, नेत्र एवं ईएनटी (ENT) जांच।
  • परीक्षण: ईसीजी (ECG), ब्लड प्रेशर और शुगर की जांच की गई।
  • कुल लाभार्थी: लगभग 384 मरीजों का स्वास्थ्य परीक्षण हुआ।
  • उद्देश्य: सुलभ और उच्च गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करना।

Monday, April 6, 2026

पशुओं को खुरपका-मुंहपका रोग से बचाने के लिए किया गया टीकाकरण

वेटरनरी विभाग द्वारा जिले के ग्राम नीमटोन में पशुओं को खुरपका-मुंहपका (एफएमडी) रोग से सुरक्षित रखने के लिए पशुओं का एफएमडी टीकाकरण किया गया तथा रोग की निगरानी के उद्देश्य से प्री-वैक्सीनेशन सैंपल भी एकत्रित किए गए। विभागीय टीम ने पशुपालकों को पशुओं के स्वास्थ्य के प्रति सजग रहने और समय-समय पर टीकाकरण कराने की सलाह दी।


 क्या है खुरपका-मुंहपका (एफएमडी) रोग

खुरपका-मुंहपका (FMD) पशुओं में होने वाला एक अत्यधिक संक्रामक और घातक विषाणु (वायरल) रोग है, जो मुख्य रूप से दो खुर वाले पशुओं जैसे गाय, भैंस, भेड़, बकरी और सूअर को प्रभावित करता है। यह 'पिकोरना' परिवार के 'एफथोनस' (Aphthovirus) विषाणु के कारण होता है।


प्रमुख लक्षण (Symptoms)

संक्रमित पशु में निम्न लक्षण दिखाई देते हैं:

  • तेज बुखार: पशु को 104°F से 106°F तक बुखार रहता है।
  • मुंह में छाले: जीभ, मसूड़ों और होठों पर फफोले या छाले पड़ जाते हैं, जिससे पशु को खाने-पीने में बहुत दर्द होता है।
  • लार टपकना: मुंह से लगातार अत्यधिक लार गिरती रहती है।
  • खुरों में घाव: खुरों के बीच में सूजन और घाव हो जाते हैं, जिससे पशु लंगड़ाकर चलने लगता है।
  • उत्पादन में कमी: दूध देने वाले पशुओं के दूध उत्पादन में भारी गिरावट आती है।
  • अन्य: थनों में सूजन, भूख न लगना, सुस्ती और गाभिन पशुओं में गर्भपात की स्थिति बन सकती है।


रोग फैलने के कारण (Causes of Spread)

यह बीमारी बहुत तेजी से फैलती है और इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

  • संक्रमित पशु के सीधे संपर्क में आने से।
  • दूषित चारा और पानी के सेवन से।
  • हवा के जरिए भी यह विषाणु फैल सकता है।
  • पशुओं के परिवहन वाहनों और उपकरणों के माध्यम से।


बचाव और नियंत्रण (Prevention & Control)

  • टीकाकरण (Vaccination): एफएमडी वैक्सीनेशन इस रोग से बचाव का सबसे प्रभावी उपाय है, जिससे पशुओं की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और संक्रमण फैलने का खतरा कम होता है। बचाव का सबसे प्रभावी तरीका नियमित टीकाकरण है। सरकार द्वारा साल में दो बार (छह-छह महीने के अंतराल पर) टीकाकरण अभियान चलाया जाता है।
  • अलगाव (Isolation): बीमार पशु को तुरंत स्वस्थ पशुओं से अलग कर देना चाहिए।
  • साफ-सफाई: पशुशाला में फिनाइल या डेटोल से सफाई करनी चाहिए और प्रभावित क्षेत्र में लोगों की आवाजाही कम रखनी चाहिए।
  • घरेलू उपचार: प्रभावित हिस्सों (मुंह और खुर) को लाल दवा (पोटेशियम परमैंगनेट) या नीम के काढ़े से धोना फायदेमंद होता है।


यह रोग इंसानों के स्वास्थ्य के लिए खतरा नहीं है, लेकिन यह पशुपालन अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचाता है।

Thursday, March 19, 2026

गर्मी में हाइपरटेंशन बन सकता है जानलेवा, इन बातों का रखें ध्यान?

हर बढ़ते दिन के साथ गर्मी का पारा ऊपर जाने लगा है। ऐसे में आने वाले दिनों में सेहत की चुनौतियां बढ़ेंगी, खासकर ब्लडप्रेशर को लेकर सतर्क रहने की जरूरत होगी। गर्मी के दिनों में रक्तचाप और हृदय से जुड़े किस तरह के हो सकते हैं जोखिम, बचाव के लिए किन बातों का रखना है ध्यान?


हृदय से जुड़ी समस्या अब हर उम्र में हो रही है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे-5 (2019-2021) के अनुसार भारत में 15 से 54 वर्ष के आयु वर्ग में हर पांच में से लगभग एक व्यक्ति को हाइपरटेंशन है। क्या आप जानते हैं कि बढ़ता तापमान न केवल जन-जीवन को अस्त-व्यस्त कर सकता है, बल्कि यह चुपके से हदय के लिए भी गंभीर खतरा उत्पन्न कर सकता है? इसलिए आने वाले दिनों में पारा बढ़ने पर कैसी होनी चाहिए आपकी तैयारी, यही समय है कि हम यह अच्छी तरह समझ लें। हालांकि हमारा शरीर मौसम के अनुकूल स्वयं ही बदलाव करने में माहिर होता है, पर उचित सावधानी न रखी जाए तो बड़ी मुसीबत पी बन सकती है। 


वास्तव में पारा बढ़ने पर रक्तवाहिकाएं शरीर को ठंडा यानी सामान्य तापमान में लाने के प्रयास में जुट जाती हैं। इस प्रक्रिया में रक्तचाप में उत्तार-चढ़ाव होता है और शरीर से पसीना भी अधिक निकलता है। यही वह चीज है, जिसका गर्मी के मौसम में सर्वाधिक ध्यान रखना चाहिए। दरअसल, पसीना निकलने से शरीर में पानी की कमी या डिहाइड्रेशन का खतरा रहता है, जिससे बचना है। अन्यथा रक्तचाप सामान्य से बहुत कम होने से नसों में थक्के जमने की आशंका रहती है। हृदय को रक्त पंप करने में समस्या आती है, उस पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है, जो आपतकालको स्थिति यानी हार्ट अटैक या स्ट्रोक की स्थिति भी उत्पन्न कर सकता है।


गर्मी में हाई ब्लड प्रेशर (Hypertension) के मरीजों को डिहाइड्रेशन, चक्कर आना, कमजोरी, और हीट स्ट्रोक का अधिक खतरा होता है। अत्यधिक गर्मी के कारण रक्त वाहिकाएं फैलने से बीपी में अचानक गिरावट या वृद्धि हो सकती है, जिससे हृदय पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है और दिल का दौरा या किडनी की समस्या का जोखिम बढ़ जाता है।


एसी के बिना रहने की आदत डालें

गर्मी शुरू होते ही घर से लेकर दफ्तर तक सब जगह एसी चलाया जाने लगता है। कुछ लोग एसी का मान बहुत कम रखना पसंद करते हैं। अगर रक्तचाप की समस्या है तो ऐसा करने से बचना चाहिए। अगर लंबे समय तक एयरकंडीशनर में काम-काज करना पड़े तो प्रयास करें कि इसे एक सामान्य तापमान 24 डिग्री सेल्सियस पर ही सेंट करें। बता दें कि अधिक कूलिंग रखने से आपको प्यास कम लग सकती है। इससे डिहाइड्रेशन का खतरा रहता है। शरीर का पसीना बाहर नहीं निकालने से शरीर में सोडियम यानी नमक बना रहता है। यह हृदयरोगियों के लिए काफी जोखिम भरा हो सकता है। एसी में निरंतर रहने के आदी होने से आप शारीरिक गतिविधि भी कम करने लगते हैं या इससे बचना चाहते हैं। साथ ही यह गर्मी सहने की क्षमता को कम करने के साथ हृदय की सेहत को भी नुकसान पहुंचा सकता है।


गर्मी में हाइपरटेंशन मरीजों के लिए प्रमुख जोखिम 

  • डिहाइड्रेशन और बीपी का उतार-चढ़ाव: पसीने के माध्यम से शरीर से पानी और इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी हो जाती है, जो रक्तचाप (BP) को अस्थिर कर सकता है।
  • हृदय पर अतिरिक्त बोझ: शरीर को ठंडा रखने के लिए हृदय को सामान्य से अधिक मेहनत करनी पड़ती है, जो दिल का दौरा या अनियमित धड़कन का कारण बन सकता है।
  • दवाओं का प्रभाव: उच्च रक्तचाप की कुछ दवाएं (जैसे मूत्रवर्धक या डाययुरेटिक्स) गर्मी में निर्जलीकरण (dehydration) के जोखिम को बढ़ा सकती हैं।


उच्च रक्तचाप और हाइपरटेंशन

सामान्य रक्तचाप 120/80 होना चाहिए पर हाइपरटेंशन है तो यह 140/90 के आसपास रहता है। एक रीडिंग में उच्च रक्तचाप है तो यह हाइपरटेंशन हो आवश्यक नहीं। सात दिन लगातार मापने के बाद यदि तीन दिन या इससे अधिक समय तक उच्च रक्तचाप रहे तो आप इसकी चपेट में हो सकते हैं। 


हाइपरटेंशन है छिपा हुआ खतरा 

विश्व स्वास्थ्य संगठन के ग्लोबल रिपोर्ट आन हाइपरटेंशन 2025 के अनुसार, वैश्विक आबादी का तकरीबन 34 प्रतिशत हिस्सा हाइपरटेंशन से पीड़ित है। भारत में 21 करोड़ से ज्यादा वयस्क हाइपरटेंशन से पीड़ित हैं। इनमें से 17 करोड़ का रक्तचाप अनियंत्रित रहता है।


डिहाइड्रेशन से बचें

शरीर के तापमान को स्थिर बनाने के लिए पानी जरूरी है। इससे हार्ट को काम करने में आसानी होती है। गर्मी के दिनों में खूब पसीना निकलता है। इसे संतुलित रखने के लिए नींबू पानी, पुदीने और खीरे के पानी का उपयोग भी कर सकते हैं। ओआरएस का घोल भी ले सकते हैं।


रक्तचाप की जांच: बचाव का बेहतर उपाय

सर्दी में हृदयरोगियों को सावधानी बरतनी होती है तो गर्मी में भी अलग तरह की दिक्कत होती है। इसमें सबसे आम है रक्तचाप का कम होना। इसके लिए आपको पानी खूब पीना चाहिए। शरीर को डिहाइड्रेशन से बचाने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए। नियमित रक्तचाप जांच कराएं ताकि उसे नियंत्रण में रखने में आसानी हो। यदि हाइपरटेंशन है तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए। यह एक छुपा हुआ जोखिम है, जो लापरवाही से आपको गंभीर हृदयरोग की स्थिति में पहुंचा सकता है।


डाक्टर की सलाह से ही दवाइयां कम करें

गर्मी में ऐसी जगहों पर जाने से परहेज करें जहां अधिक गर्मी और घुटन हो या पसीना आने के साथ लंबे समय तक खड़े रहना पड़े। अक्‍सर देखा गया है कि ऐसे में बीपी Low हो जाता है और लोग बेहोश हो जाते हैं। वहीं, यदि आप हृदयरोग से जुड़ी समस्याओं की दवाइयां ले रहे हैं तो यह भी रक्तचाप को कम कर सकती हैं। दरअसल, इन दवाइयों का काम ही होता है आपके शरीर के अतिरिक्त द्रव को निकालना या रक्तचाप कम करना, लेकिन स्वयं से दवाइयां कम न करें। चिकित्सक से ही पता चलेगा कि आपकी वास्तविक स्थिति क्या है और कौन सी व कितनी दवा कम करनी है।


खानपान में रखें ध्यान

  • सोडियम की मात्रा, अम्ल और क्षार का संतुलन और कोशिकाओं के सामान्य कार्य के लिए जरूरी है, लेकिन इसकी अधिकता रक्तचाप बढ़ा सकती है।
  • फलों व सब्जियों में पोटेशियम पर्याप्त होता है, हृदय की सेहत के लिए यह जरूरी है।
  • ताजे फल व सब्जियों का सेवन करें। साबुत अनाज और फलियों का सेवन अच्छा है।
  • मोटें अनाज जो इस मौसम के अनुकूल है, जैसे जौ, रागी आदि का सेवन करें।
  • अधिक ठंडे खाद्य पदार्थ के सेवन से परेशानी महसूस कर सकते हैं, उसे सामान्य करें।
  • घी, सरसों तेल अच्छे माने गए है, पर इनका सेवन भी सीमित करना चाहिए।
  • जंक व मसालेदार खाने को ना कहे। डिब्बाबंद खाना भी आपके लिए सही नहीं है।
  • वजन कम करने के लिए खाना छोडने जैसे अचानक बदलाव घातक प्रभाव डाल सकते है।


गर्मी में हाइपरटेंशन मरीजों के लिए प्रमुख सावधानियां

  • भरपूर पानी पिएं: शरीर में पानी की कमी न होने दें, भले ही प्यास न लगे।
  • धूप से बचें: अत्यधिक गर्मी या बढ़े हुए तापमान में बाहर जाने से बचें। सुबह 11 बजे से दोपहर 4 बजे के बीच बाहर निकलने से बचें। 
  • बीपी चेक करें: अपना ब्लड प्रेशर नियमित रूप से मॉनिटर करते रहें।
  • खान-पान: कैफीन, शराब और मीठे पेय पदार्थों से बचें।
  • हल्के कपड़े पहनें: सूती और ढीले कपड़े पहनें। सूती व आरामदायक वस्त्र का चयन करे ताकि शरीर को ठंडा रहने में मदद मिले।
  • शारीरिक गतिविधि: कसरत व शारीरिक गतिविधि करते रहे। स्वस्थ तनाव प्रबंधन के तरीके जानें।


इनका भी रहे ध्यान

यदि चक्कर आना, सिरदर्द, या जी मिचलाने जैसे लक्षण दिखें, तो तुरंत किसी ठंडी जगह पर जाएं और डॉक्टर से सलाह लें। 


Note: इसका मकसद सिर्फ़ जानकारी देना है। स्वास्थ्य से जुड़ी सलाह या जांच के लिए, किसी पेशेवर डॉक्टर से बात करें।

Tuesday, March 10, 2026

संक्रमण और थकान हो सकते हैं Aplastic Anemia के संकेत

एप्लास्टिक एनीमिया एक दुर्लभ और गंभीर ब्लड डिसऑर्डर है, जिसमें बोन मैरो पर्याप्त मात्रा में रेड ब्लड सेल्स, व्हाइट ब्लड सेल्स और प्लेटलेट्स का निर्माण नहीं कर पाता। भारत में हर साल कई लोगों की मृत्यु एप्लास्टिक एनीमिया के कारण होती है। कई मरीजों में इसका सही कारण पता नहीं चल पाता, लेकिन यह स्थिति ऑटोइम्यून डिसऑर्डर्स, वायरल इंफेक्शन्स और कुछ टॉक्सिक सब्सटेंसेस, केमिकल्स और रेडिएशन के कॉन्टैक्ट से जुड़ी हो सकती है।


कंसल्टेंट, पीडियाट्रिक हीमेटो-ऑन्कोलॉजी एवं बीएमटी, के अनुसार बोन मैरो शरीर का ब्लड सेल बनाने वाला मुख्य केंद्र होता है। जब यह केंद्र धीमा पड़ जाता है या काम करना बंद कर देता है, तो इसके परिणाम जानलेवा हो सकते हैं। मरीज बार-बार इंफेक्शन, अत्यधिक थकान और अनकंट्रोल्ड ब्लीडिंग के प्रति संवेदनशील हो जाते हैं। हालांकि एप्लास्टिक एनीमिया एक गंभीर डिसऑर्डर है, लेकिन इसके प्रभावी इलाज उपलब्ध हैं। कई योग्य मरीजों के लिए ब्लड स्टेम सेल ट्रांसप्लांट एक संभावित इलाज और जीवन का दूसरा अवसर दे सकता है।


भारतीय आंकड़े बताते हैं कि बोन मैरो फेल्योर सिंड्रोम में एप्लास्टिक एनीमिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है। कई मरीज डॉक्टर के पास तब पहुंचते हैं जब लैबोरेटरी रिपोर्ट में पैनसाइटोपेनिया पाया जाता है, यानी शरीर में रेड ब्लड सेल्स, व्हाइट ब्लड सेल्स और प्लेटलेट्स की कमी। इंडियन जर्नल ऑफ हेमेटोलॉजी एंड ब्लड ट्रांसफ्यूजन में प्रकाशित शोध में बताया गया है कि भारत में बोन मैरो फेल्योर के मामलों का बड़ा हिस्सा एप्लास्टिक एनीमिया के कारण होता है।


रिकॉर्ड के अनुसार, भारत में मरीज पश्चिमी देशों की तुलना में कम उम्र में ही बीमारी के लक्षण दिखाने लगते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि जागरूकता और समय पर पहचान कितनी आवश्यक है।


एप्लास्टिक एनीमिया में क्या होता है?


एक सामान्य शरीर में बोन मैरो लगातार रेड ब्लड सेल्स बनाता है, जो शरीर में ऑक्सीजन पहुंचाते हैं; व्हाइट ब्लड सेल्स, जो इंफेक्शन्स से लड़ते हैं; और प्लेटलेट्स, जो ब्लीडिंग रोकते हैं। एप्लास्टिक एनीमिया में यह निर्माण प्रक्रिया रुक जाती है। अधिकतर मामलों में इम्यून सिस्टम ब्लड बनाने वाली स्टेम सेल्स पर हमला कर उन्हें नष्ट कर देता है, जो रक्त के सभी कंपोनेंट्स के निर्माण के लिए जिम्मेदार होती हैं।


जैसे-जैसे ब्लड सेल्स की संख्या घटती है, लक्षण दिखाई देने लगते हैं। हीमोग्लोबिन कम होने से लगातार थकान, कमजोरी, हल्का काम करने पर भी सांस फूलना और पीलापन दिखाई देता है। व्हाइट ब्लड सेल्स की कमी से मरीज बार-बार या गंभीर इंफेक्शन के शिकार हो जाते हैं। प्लेटलेट्स कम होने से आसानी से चोट लगना, मसूड़ों या नाक से ब्लीडिंग होना, छोटे कट पर भी देर तक ब्लीडिंग रहना और त्वचा पर नीले निशान पड़ना जैसे लक्षण दिखते हैं।


डॉक्टर हीमोग्लोबिन, व्हाइट ब्लड सेल्स और प्लेटलेट्स की कमी की इस स्थिति को पैनसाइटोपेनिया कहते हैं। समय पर कम्प्लीट ब्लड काउंट और आवश्यकता होने पर बोन मैरो जांच कर सही डायग्नोसिस और ट्रीटमेंट शुरू करना बहुत जरूरी है।


क्या इसका उपचार संभव है?


हाँ। इलाज का चुनाव बीमारी की गंभीरता, मरीज की उम्र और उसकी हेल्थ कंडीशन पर निर्भर करता है। कुछ मामलों में इम्यूनोसप्रेसिव दवाओं से बीमारी को नियंत्रित किया जा सकता है, जिससे ब्लड सेल्स की संख्या बढ़ सकती है। लेकिन कई मरीजों, खासकर गंभीर रूप से प्रभावित युवाओं के लिए, ब्लड स्टेम सेल ट्रांसप्लांट सबसे प्रभावी और आशाजनक ट्रीटमेंट हो सकता है।


ट्रांसप्लांट की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि डोनर का एचएलए प्रोफाइल मरीज से कितना मैच करता है। डॉक्टर 10/10 एचएलए मैच की तलाश करते हैं, जिससे कॉम्प्लिकेशन्स कम हों और रिजल्ट बेहतर मिलें। दुर्भाग्य से, परिवार में उपयुक्त मैच केवल लगभग 30 प्रतिशत मरीजों को ही मिल पाता है। बाकी 70 प्रतिशत मरीज नेशनल या इंटरनेशनल रजिस्ट्रियों में दर्ज अनरिलेटेड डोनर्स पर निर्भर रहते हैं।


भारत में रजिस्टर्ड ब्लड स्टेम सेल डोनर्स की संख्या अभी कम है जिसके कारण मरीजों के लिए ट्रांसप्लांट तक पहुंच काफी सीमित हो जाती है।


गलत जानकारी डोनर रजिस्ट्रेशन में बड़ी बाधा है। दर्द, लंबे समय तक हेल्थ पर असर या फर्टिलिटी पर प्रभाव जैसी गलत धारणाएं लोगों को हतोत्साहित करती हैं। वास्तव में, ब्लड स्टेम सेल डोनेशन एक सुरक्षित और वॉलंटरी प्रक्रिया है और ज्यादातर मामलों में प्लेटलेट्स डोनेशन के समान होती है।


एप्लास्टिक एनीमिया के मैनेजमेंट के लिए सरकारी सपोर्ट, डोनर रजिस्ट्रेशन कैंपेन और डोनर पूल बढ़ाने की आवश्यकता है। बार-बार इंफेक्शन, अत्यधिक थकान, बिना कारण ब्लीडिंग और नीले निशान जैसे लक्षणों की समय पर पहचान से जल्दी डायग्नोसिस और रेफरल संभव है। साथ ही, डोनर बेस मजबूत करने से पूरे भारत में हजारों मरीजों को जीवनदान दिया जा सकता है।

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