स्टार्टअप शुरू करना चाहते हैं और हाथों में करोड़ों की पूंजी नहीं है। इसे पॉपुलर बनाने का प्लान रेडी करने की शुरुआत कर रहे हैं, तो बूटस्ट्रैपिंग का कॉन्सेप्ट समझने की जरूरत है। खास बात है कि दुनिया की दिग्गज कंपनियों जैसे अमेजॉन, गोप्रो और फेसबुक ने भी यही कॉन्सेप्ट अपनाया और सफलता का रास्ता तय किया। जानिए क्या है बूटस्ट्रैपिंग और कैसे इसका फायदा उठाया जा सकता है।
क्या है बूटस्ट्रैपिंग ?
बूटस्ट्रैपिंग का मतलब है बिना किसी बाहरी फंडिंग के स्टार्टअप की शुरुआत करना। इस पूरी प्रक्रिया में किसी बिजनेस को खुद के दम पर तैयार करना होता है। इस तरह बूटस्ट्रैपिंग वो प्रक्रिया है जब बिजनेस की शुरुआत जीरो से होती है बिना किसी मदद के। इसके लिए आप खुद की सेविंग का इस्तेमाल करते हैं। आमतौर इसकी शुरुआत छोटे स्तर से होती है, लेकिन इसका दायरा धीरे-धीरे बढ़ाया जाता है। जैसे-जैसे इसका दायरा बढ़ता है और बेहतर रणनीति लागू करते हैं, यह आगे बढ़ता है।
इतनी सारी चुनौतियां भी ऐसे समझें
बूटस्ट्रैपिंग वो प्रक्रिया है जब बिजनेस की शुरुआत जीरो से होती है बिना किसी बाहरी मदद के। इसके लिए आप खुद की सेविंग का इस्तेमाल करते हैं।
मान लीजिए आप किसी वेबसाइट की शुरुआत करना चाहते हैं और उससे कमाई करने का प्लान बनाया है। इसमें 10 हजार रुपए सेविंग लगाई। फिर इस वेबसाइट के जरिए प्रोडक्ट सेल किए। कमाई से हुए प्रॉफिट की मदद से सोशल मीडिया पर विज्ञापन चलाए। इस तरह बिजनेस को बढ़ाते हैं।
चुनौतियां-
- पैसों की लिमिट: कई बार पैसों की कमी के कारण ओनर स्टार्टअप का दायरा नहीं बढ़ा पाते।
- स्लो ग्रोथः ऐसे स्टार्टअप की ग्रोथ स्लो होती है क्योंकि ये धीरे-धीरे आगे बढ़ते हैं। बढ़ोतरी होने या पिछड़ने के लिए आप ही जिम्मेदार होते हैं।
- रिस्क आपकाः साझेदारी की स्थिति में रिस्क बंटने पर बोझ आधा हो जाता हैं, लेकिन इसमें ऐसा नहीं होता।
ये स्टार्टअप धीरे-धीरे आगे बढ़ते हैं और कई मामलों में बेहतर साबित होते हैं।
क्या हैं इसके फायदे ?
- फुल कंट्रोलः आपके स्टार्टअप में कोई साझेदार नहीं होता। यानी व्यापार में प्रॉफिट का हिस्सा किसी को नहीं देना पड़ता। इस तरह पूरे कारोबार का आपका कंट्रोल रहता है। आप किसी भी तरह का फैसला लेने के लिए स्वतंत्र रहते हैं।
- प्रेशर कमः बूटस्ट्रैपिंग के मामले में दबाव कम होता है। स्टार्टअप ओनर हालात के मुताबिक रणनीति बना सकता है। इसके लिए किसी की अनुमति या सलाह देने की बाध्यता नहीं होती है। किसी भी फैसले को लेने के लिए पार्टनर से न पूछना पड़ता है या उसे बताने की जरूरत महसूस होती है।
- लाभ पर फोकसः स्टार्टअप ओनर अपने फायदे पर फोकस करते हैं। कम पूंजी के साथ स्टार्टअप का दायरा बढ़ाते हुए वे आगे बढ़ते हैं। जो भी फायदा होता है उसका कुछ हिस्सा स्टार्टअप को फायदा पहुंचाने वाली नीतियों को लागू करने में किया जाता है।
- किफायती सोचः स्टार्टअप ओनर जो भी रणनीति बनाते हैं वो इस सोच के साथ बनाते हैं कि जिनके लिए फंडिंग की बाध्यता न हो। इस तरह वो धीरे-धीरे ही सही आगे बढ़ते रहते हैं।


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