उप मुख्यमंत्री श्री राजेन्द्र शुक्ल ने गत दिवस महा अष्टमी पर रीवा के गुढ़ के समीप भैरवनाथ मंदिर में भगवान के दर्शन किए। उन्होंने भैरवनाथ लोक में निर्मित कार्यों का निरीक्षण किया तथा प्रगतिरत कार्यों के बारे में जानकारी प्राप्त करते हुए उन्हें शीघ्र पूर्ण करने के निर्देश दिए। उप मुख्यमंत्री ने बूढ़ी माता मंदिर में माता के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया तथा प्रदेशवासियों के सुख-समृद्धि की कामना की।
भगवान भैरवनाथ और माँ बूढ़ी माता का गहरा आध्यात्मिक संबंध है, जो विशेष रूप से भारत के विभिन्न क्षेत्रीय लोक विश्वासों और मंदिर परंपराओं में देखने को मिलता है।
यहाँ उनसे संबंधित कुछ प्रमुख बिंदु दिए गए हैं:
1. माँ बूढ़ी माता और भगवान भैरवनाथ का संबंध
आध्यात्मिक मिलन: कई क्षेत्रों में माँ बूढ़ी माता को शक्ति का स्वरूप और भगवान काल भैरव को उनका रक्षक या भाई माना जाता है। हिमाचल प्रदेश जैसे स्थानों पर देव काल भैरव अपनी बहन राजमाता बूढ़ी भैरवा (माँ बूढ़ी माता) से मिलने जाते हैं, जो एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और धार्मिक परंपरा है।
माँ का स्वरूप: माँ बूढ़ी माता को अक्सर महाकाली का एक चमत्कारी अवतार माना जाता है, जिन्हें बंजारों की देवी के रूप में भी पूजा जाता है। उनकी आराधना अक्सर भगवान अघोर शिव या भैरव के साथ की जाती है।
2. प्रमुख मंदिर और पूजा स्थल
रीवा (मध्य प्रदेश): रीवा में भगवान भैरवनाथ और माँ बूढ़ी माता का एक अत्यंत प्राचीन और सिद्ध मंदिर है। यहाँ के मंदिर परिसर में माँ बूढ़ी माता की दिव्य शक्ति के दर्शन हेतु भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है।
मंदिर की विशेषता: माँ बूढ़ी माता के मंदिर अक्सर नगर के बाहर या श्मशान भूमि के समीप स्थित होते हैं। भक्तों का मानना है कि यहाँ दर्शन मात्र से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और नकारात्मक शक्तियों से मुक्ति मिलती है।
3. धार्मिक महत्व
सुरक्षा और रक्षक: तंत्र शास्त्र में भैरवनाथ को क्षेत्रपाल (क्षेत्र के रक्षक) माना जाता है, जबकि माँ बूढ़ी माता को ममतामयी शक्ति का रूप दिया गया है जो अपने भक्तों के कष्टों को दूर करती हैं।
भक्ति परंपरा: इन दोनों देवताओं की पूजा अक्सर एक साथ या एक ही परिसर में की जाती है ताकि भक्त को शक्ति (माता) और सुरक्षा (भैरव) दोनों का आशीर्वाद मिल सके।
